शनिवार, 3 सितंबर 2011

ठहराव

क्या नदिया  भी रुक जाना चाहती है 
क्या लहरें भी झुक  जाना चाहती है
बादल भी थक जातें है बरसकर 
तूफान भी लोट जाता है गरजकर 
जिंदगी भी चाहती है ठहराव
अब भिखरे हुए आँगन को 
समेटना चाहती है ये माँ
बाग़ मैं फैले  हुए फूलों की 
इक माला बनाना चाहती हूँ  
बच्चों को आँचल मैं छुपाना चाहती हूँ
अब इस बहाव को रोकना चाहती हूँ
हर नदी अब अपना रास्ता बदलकर 
इस सागर मैं आ जाये 
बस  यही चाहती हूँ मैं
बस इस जिंदगी का ठहराव
 चाहती हूँ मैं