क्या नदिया भी रुक जाना चाहती है
क्या लहरें भी झुक जाना चाहती है
बादल भी थक जातें है बरसकर
तूफान भी लोट जाता है गरजकर
जिंदगी भी चाहती है ठहराव
अब भिखरे हुए आँगन को
समेटना चाहती है ये माँ
बाग़ मैं फैले हुए फूलों की
इक माला बनाना चाहती हूँ
बच्चों को आँचल मैं छुपाना चाहती हूँ
अब इस बहाव को रोकना चाहती हूँ
हर नदी अब अपना रास्ता बदलकर
इस सागर मैं आ जाये
बस यही चाहती हूँ मैं
बस इस जिंदगी का ठहराव
चाहती हूँ मैं
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