रविवार, 29 मई 2011

उड़ान

जिंदगी ठहर सी गयी 
आशाएं भी सो गयी है 
परिंदे उड़ गए है                                                                            
चिड़िया टकटकी लगाये क्यों बेठी है 
चिड़िया ने एक एक दाना मुख मैं डाल
बड़ा किया अपने परिंदों को 
इस उम्मीद से क़ि वे बहुत उचीं
उड़ान भरेंगे आसमान मैं 
सबसे उचें रहेंगे सदा 
लेकिन अब क्यों तुम बेठी हो
टकटकी लगाये 
बरगद का ये पेड़ नहीं भाये अब उनको 
उचीं इमारतों क़ी अटरिया मैं 
घोसंला बनाया है तेरे परिंदों ने 
क्यूँ क्यूँ तुने उन्हें उड़ना सिखाया 
क्यूँ बेठी है तू अब टकटकी लगाये 
ये विशाल वृक्ष क्यूँ लगे तुझे सूना
जब आएगी मौसम मैं बहार 
तुझसे मिलने आयेंगे तेरे परिंदे 
कुछ पल खुशियों के तेरे दामन मैं डालकर 
फिर उड़ जायेंगे तुझे अकेला छोड़कर 
पर फिर भी हर चिड़िया अपने परिंदों को 
उड़ना सिखाती है 
देती है आशीर्वाद उचीं उड़ान भरने के लिए 
फिर क्यूँ बेठी है तू टकटकी लगाये 

                                 दिपगीरी

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